अपने जीवन कि अनमोल बाते जो हर कोई नहि बता सकता जाने.।

प्र●1● अपने जीवन कि अनमोल बाते जो हर कोई नहि बता सकता जाने.।

12,December,2018

जीवन का भी कोई लक्ष्य
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◆चलना जीवन का धर्म है, किन्तु चलना और प्रगति एक चीज नहीं हैं,क्या आपके जीवन का भी कोई लक्ष्य नहीं होता है, तो दोस्तों, यह सोच सुनने में तो अच्छी लगती है कि हम औरों से सदा चार कदम आगे रहें परन्तु क्या यह सम्भव है, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस प्रकार की सोच बना कर हम जीवन में हर स्थिति कठिन कर लें, नहि पर,सबसे पहले आपको अपना लक्ष्य निर्धारित करना होता है, ऐसा नहीं है आप एक बार में ही लक्ष्य निर्धारित कर लोगे, कई बार हमें खुद नहीं पता चल पाता है कि क्या करें, हमारी रूचि किस चीज में है,हम सोचते हैं कि हम सब कुछ कर सकते हैं,घबराने की जरूरत नहीं है, आपको कोई भी काम पसंद है वो आप करना शुरू कीजिये, अगर आप नौकरी करते हैं तो उसी के बीच समय निकालिये या फिर घर आने के बाद,क्योंकि आपको समय तो देना ही पड़ेगा, केवल ख्याली पुलाव पकाने से बात नहीं बनने वाली है, आपको जो पसंद है आप उसे करिये एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार दिन, 1 महीना, 2 महीना, यदि उसको करते करते आपका दिल नहीं भरता है,मन करता है कि ये काम करता रहूं करता रहूं तो आप उस काम को लक्ष्य बना सकते हो.।

आपके जीवन में उद्देश्य
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आपके जीवन में उद्देश्य,पूर्णता तथा सन्तुष्टि कैसे खोज सकता हूँ, क्या मैं किसी बात के चिरस्थायी महत्व की प्राप्ति कर सकता हूँ, बहुत सारे लोगों ने इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के ऊपर सोचना कभी नहीं छोड़ा है, वे सालों पीछे मुड़कर देखते हैं और आश्चर्य करते हैं कि उनके सम्बन्ध क्यों नहीं टूटे और वे इतना ज्यादा खालीपन का अहसास क्यों करते हैं, हालाँकि उन्होंने वह सब कुछ पा लिया जिसको पाने के लिए वे निकले थे, एक खिलाड़ी जो बेसबाल के खेल में बहुत अधिक ख्याति के शिखर पर पहुँच चुका था, से पूछा गया कि जब उसने शुरू में बेसबाल खेलना आरम्भ किया था तो उसकी क्या इच्छा थी कि कोई उसे क्या सलाह देता, उसने उत्तर दिया, "मेरी इच्छा थी कि कोई मुझे बताता कि जब आप शिखर पर पहुँच जाते हैं, तो वहाँ पर कुछ नहीं होता।" कई उद्देश्य अपने खालीपन को तब प्रकट करते हैं जब केवल उनका पीछा करने में कई वर्ष व्यर्थ हो गए होते हैं
हमारी मानवतावादी संस्कृति में, लोग कई उद्देश्यों का पीछा, यह सोचकर करते हैं कि इनमें वे उस अर्थ को पा लेंगे,इनमें से कुछ कार्यों में: व्यापारिक सफलता, धन-सम्पत्ति, अच्छे सम्बन्ध, यौन-सम्बन्ध, मनोरंजन, दूसरों के प्रति भलाई, वगैरह सम्मिलित है, लोगों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि जब उन्होंने धन-सम्पत्ति, सम्बन्धों और आनन्द के लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया, तब भी उनके अन्दर एक गहरी शून्यता थी, खालीपन का एक ऐसा अहसास जिसे कोई वस्तु भरती हुई प्रतीत नहीं होती,

{एक बार जब आप अपना उद्देश्य जान लेते हैं तो जीवन में और भी ज्यादा अर्थ भर जाता है}
★पर आप जानते है की,एक हथौड़े पर विचार कीजिए, कीलों पर प्रहार करने के लिए ही उसका खाका तैयार किया गया, यही करने के लिए उसकी रचना की गई, अब कल्पना कीजिए कि हथौड़े का कभी प्रयोग नहीं हुआ, वह औजार बॉक्स में ही रखा रहा,हथौड़े ने भी इसकी परवाह नहीं की,पर अब कल्पना कीजिए कि उसी हथौड़े की अपनी एक आत्मा है, आत्मजागरूकता है, औजारबॉक्स में रहते हुए दिन बीतते जाते हैं,अंदर हथौड़े को अजीब सा महसूस होता है, पर उसे समझ में नहीं आता क्यों, कुछ है जो अनुपस्थित है, पर उसे नहीं पता वह क्या है ,फिर एक दिन कोई उसे खींचकर औजार बॉक्स से बाहर निकालता है और उसका प्रयोग आग रखने के स्थान के लिए कुछ शाखाओं पर प्रहार करने के लिए करता है, हथौड़ा खुशी से पागल हो जाता है,उसे पकड़ा गया, ताकत लगाई गई और शाखाओं पर प्रहार किया गया - हथौड़े को बहुत अच्छा लगा, पर दिन के समाप्त होने पर , उसमें फिर भी असंतोष था, शाखाओं पर प्रहार करने में उसे मजा आया, पर वही सबकुछ नहीं था, कुछ फिर भी अनुपस्थित था,बाकी जो दिन आते गए, उसमें बहुत बार उसे प्रयोग में लाया गया, उसने हबकैंप का नया ढाँचा गढ़ा, चट्टान की नई परत में विस्फोट किया, एक मेज के पाए पर प्रहार करके उसे अपने स्थान पर लगाया, फिर भी वह असंतुष्ट और अपूर्ण था, अतः वह ज्यादा से ज्यादा कार्य करना चाहता था, अपने चारों तरफ की चीजों पर प्रहार करने के लिए, उन्हें तोड़ने के लिए, विस्फोट करने के लिए, चीजों पर पैबन्द लगाने के लिए वह ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में लाया जाना चाहता था, उसे लगता था कि ये सभी घटनाएँ उसे संतुष्ट करने के लिए काफी नहीं थी,उसे विश्वास था कि उन सबका ज्यादा मात्रा में होना ही उसकी संतुष्टि का कारण होगा,फिर एक दिन किसी ने उसका प्रयोग कील के साथ किया, अचानक, उस हथौड़े की आत्मा प्रकाशित हो गई, अब उसकी समझ में आया कि वास्तव में कौन सा काम करने के लिए उसे बनाया गया है, उसका मुख्य काम कीलों पर प्रहार करना था, उसने अब तक जितनी भी चीजों पर प्रहार किया था वे सभी इसकी तुलना में फीकी थीं, अब वह हथौड़ा जान गया था कि इतने दिनों से उसकी आत्मा क्या ढूँढ़ रही थी,हमें ईश्वर की छवि में रचा गया है ताकि हम उसके साथ एक रिश्ता बना सकें, उस रिश्ते में रहना ही हमारी आत्मा की संतुष्टि का एकमात्र कारण हो सकता है,ईश्वर को जानने के पहले हमें कई आश्चर्यजनक अनुभव होते हैं, पर हमने उस समय तक कील पर प्रहार नही किया होता है हमारा प्रयोग किसी नेक उद्देश्य के लिए किया गया होता है, पर उसके लिए नहीं जिसके लिए हमें रचा गया है और जिससे हमें पूरी संतुष्टि और पूर्णता प्राप्त होगी, ऑगस्टाइन ने इसे संक्षेप में इस तरह कहा है,आपने (ईश्वर) हमें अपने लिए रचा है और हमारा ह्रदय तब तक अशांत रहता है जब तक वह आपकी शरण में आराम न ले ले,परमेश्वर के साथ रिश्ता ही एकमात्र रास्ता है जो हमारी आत्मा की प्यास को बुझा सकता है,यीशु ने कहा, “ मैं जीवन की रोटी हूँ, जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा नहीं रहेगा और जो मेरे ऊपर विश्वास करेगा वह कभी प्यासा नहीं रहेगा,” जब तक हम ईश्वर को नहीं जानते तब तक हम जीवन में भूखे और प्यासे रहते हैं, हम सभी तरह की चीजों को “ खाने ” और “ पीने ” का प्रयास करते हैं ताकि हमारी भूख और प्यास मिट सके, पर फिर भी वह वैसी ही रहती है,हम हथौड़े की तरह हैं, हमें पता नहीं चलता है कि हमारा खालीपन कैसे खत्म होगा, हमारे जीवन में संतुष्टि और पूर्णता की कमी कैसे पूरी होगी ,यहाँ तक कि नाजी शिविर के बीच कोरी टेन बूम को ईश्वर पूर्ण संतुष्टि देनेवाले लगे, “ हमारी खुशी की नींव वह है जिसे हम खुद जानते हैं और जो यीशु के साथ ईश्वर में छिपी है,हमें ईश्वर के प्रेम पर विश्वास रखना चाहिए, हमारी चट्टान जो कि घोर अंधकार से ज्यादा मजबूत है,
ज्यादातर जब हम ईश्वर को दूर रखते हैं और हम संतुष्टि और पूर्णता ईश्वर को छोड़कर किसी और वस्तु में खोजते हैं तब वह हमें पूरी नहीं मिलती, हम ज्यादा से ज्यादा “ खाते ” और “ पीते ” हैं और गलत सोचते हैं कि हमारी समस्या का हल “ ज्यादा ” में है, पर हम कभी भी अंत में संतुष्ट नहीं हो पाते हैं, हमारी सबसे बड़ी इच्छा ईश्वर को जानने में, उसके साथ रिश्ता बनाने में है, क्यों , क्योंकि हमें उसी तरह बनाया गया है, क्या आपने अभी तक कील पर प्रहार किया है ,
प्रश्नकर्ता >जब मैं लोगों के कष्ट और दुःख में देखता हूँ, तब मुझे बहुत दुःख होता है,तब मैं क्या करूँ, कृपया सलाह दीजिए,आत्मज्ञान के बाद सामनेवाले मनुष्य को चाहे कुछ भी हो, पर आपको दुःख होता नहीं और उसका दुःख दूर होता है, फिर आपको करुणा रहेगी, ये अभी तो आपको दया रहती है कि बेचारे को कितना दुःख होता होगा, कितना दुःख होता होगा, उसकी आपको दया रहती है, वह दया हमेशा हमें दुःख देती है, दया हो, वहाँ अहंकार होता ही है, दया के भाव के बिना प्रकृति सेवा करती ही नहीं और आत्मज्ञान के बाद आपको करुणा भाव रहेगा.

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