जीवन के सुख दुख के फायदे.!

प्र●●जीवन का सुख और दुख  क्या.!

06,August,2018

◆जीवन क्या है > हमारे जीवन में इंसान बहूत दुःख या बहूत सुख पाता है, जीवन एक अनमोल है जो हमारे स्वथ जीवन पर लागू होता है दुख ही दुख अगर पाया है तो बड़ी मेहनत की होगी पाने के लिए, बड़ा श्रम किया होगा, बड़ी साधना की होगी, तपश्र्चर्या की होगी अगर दुख ही दुख पाया है तो बड़ी कुशलता अर्जित की होगी! दुख कुछ ऐसे नहीं मिलता, मुफ्त नहीं मिलता दुख के लिए कीमत चुकानी पड़ती है आनंद तो यूं ही मिलता है; मुफ्त मिलता है; क्योंकि आनंद स्वभाव है दुख अर्जित करना पड़ता है और दुख अर्जित करने का पहला नियम क्या है सुख मांगो और दुख मिलेगा सफलता मांगो, विफलता मिलेगी सम्मान मांगो, अपमान मिलेगा। तुम जो मांगोगे उससे विपरीत मिलेगा तुम जो चाहोगे उससे विपरीत घटित होगा क्योंकि यह संसार तुम्हारी चाह के अनुसार नहीं चलता यह चलता है उस परमात्मा की मर्जी से अपनी मर्जी को हटाओ अपने को हटाओ उसकी मर्जी पूरी होने दो फिर दुख भी अगर हो तो दुख मालूम नहीं होगा जिसने सब कुछ उस पर छोड़ दिया, अगर दुख भी हो तो वह समझेगा कि जरूर उसके इरादे नेक होंगे उसके इरादे बद तो हो ही नहीं सकते जरूर इसके पीछे भी कोई राज होगा। अगर वह कांटा चुभाता है तो जगाने के लिए चुभाता होगा। और अगर रास्तों पर पत्थर डाल रखे हैं उसने तो सीढ़ियां बनाने के लिए डाल रखे होंगे।और अगर मुझे बेचैनी देता है, परेशानी देता है, तो जरूर मेरे भीतर कोई सोई हुई अभीप्सा को प्रज्वलित कर रहा होगा; मेरे भीतर कोई आग जलाने की चेष्टा कर रहा होगा जिसने सब परमात्मा पर छोड़ा, उसके लिए दुख भी सुख हो जाते हैं और जिसने सब अपने हाथ में रखा, उसके लिए सुख भी दुख हो जाते हैं जिसे तुम जीवन समझ रहे हो, वह जीवन नहीं है, टुकड़े-टुकड़े मौत है जन्म के बाद तुमने मरने के सिवाय और किया ही क्या है रोज-रोज मर रहे हो और जिम्मेवार कौन है अस्तित्व ने जीवन दिया है, मृत्यु हमारा आविष्कार है अस्तित्व ने आनंद दिया है, दुख हमारी खोज है!

◆जरूर कहीं हमारे जीवन की पूरी शिक्षण की व्यवस्था भ्रांत है हमारा पूरा संस्कार गलत है हमारा पूरा समाज रुग्ण है हमें गलत सिखाया जा रहा है हमें सुख पाने के लिए दौड़ सिखाई जा रही है दौड़ो! ज्यादा धन होगा तो ज्यादा सुख होगा ज्यादा बड़ा पद होगा तो ज्यादा सुख होगा!

◆मनुष्य जीवन एक अवसर है दुखों से छुटकारा पाने का, या यूँ कहे कि सुख प्राप्त करने का मनुष्य के पास वह बुद्धि एवं धरातल है कि वह दुखों के स्वरुप को समझकर उन्हें जड़ से समाप्त कर सके प्रज्ञा से युक्त होने के कारण मनुष्य जीवन वह सुअवसर है जो उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग कर स्वयं एवं अन्य प्राणियों के सुख का स्रोत्र बन सके मनुष्य के पास अद्वितीय क्षमता है परन्तु वह आज वह उन जानवरों से भी अधिक दुखी प्रतीत होता है जिनकी मूलभूत आवश्यकताएं भी कठिनाई से पूरी होती है देखा जाए तो जानवर हमसे जल्दी सुखी हो जाते हैं, बस खाने-पीने को मिल जाए, रहने को मिल जाए उनके भीतर इससे अधिक सोचने की बुद्धि ही नहीं हम सामजिक एवं मानसिक जटिलताओं को समझ सकते हैं फिर भी हम दुखी हैं क्योंकि हम उन्ही जटिलताओं में उलझते जा रहे हैं हम जानते ही नहीं कि वास्तव में हमें क्या चाहिए मन में कामनाये उत्पन्न होना स्वभाविक है और जो हमें किसी कार्य की ओर अग्रसर करने में सहायक भी हैं उपद्रव तो तब आरम्भ होता है जब व्यक्ति कामनाओं के आधीन हो जाता है हम ज्यादा सोचते हैं इस बारे में कि हमे क्या पाना है, बजाय इसके कि हमारे पास क्या है इसका अर्थ ये नहीं कि कुछ करना ही नहीं सभी आवश्यक कार्य भी करने हैं लेकिन लक्ष्य का निर्धारण उचित होना चाहिए भारतीय सभ्यता में पुरुषार्थ चतुष्टय का वर्णन मिलता है जो मानव जीवन के उचित लक्ष्यों के विषय में मार्गदर्शन करता है!

◆सरल रूप से देखा जाए तो हमारे पास शरीर है जिसे चलाने के लिए संसाधन चाहिए परिवार है जो जरूरी भी है| उसके भरण पोषण के लिए धन चाहिए, जो कमाना बहुत कठिन नहीं परिश्रम तो करना ही होगा अगर बहुत बुरे कर्म किये हैं अधिक कठिनाइयाँ होंगी एक बहुत सुन्दर कहावत है “साईं इतना दीजिये जामे कुटुंब समाये मैं भी भूखा न रहूँ साधू ना भूखा जाए” एक गृहस्थी को इतना धन तो अवश्य कमाना चाहिए लेकिन हमने बहुत से झूठे पैमाने बना लिए हैं हमारा रहन-सहन दिखावे से परिपूर्ण हो गया है व्यक्ति की जितनी क्षमता है, वह अपने रहन-सहन से लोगों को उससे अधिक दिखाने का प्रयास करता है समाज में लोग कई बार प्रतिष्ठा के अनुचित मानक बना लेते हैं, उदाहरण के तौर पर वस्त्रों/जूतों में किसी कंपनी विशेष (ब्रांड) को प्रतिष्ठा का मानक बना लेना और भी न जाने कितने मानक हम बना लेते हैं, जिनकी पूर्ति के लिए हम अनुचित मार्ग से धन कमाने को भी तैयार हो जाते हैं ऐसे व्यर्थ के दिखावे के कारण पर्याप्त आय होते हुए भी व्यक्ति सर्वथा धन की कमी ही अनुभव करता है यह बात समझ में आने के बाद उचित मार्ग पर चलते हुए भी जब धन इतना अधिक होने लगे कि यथोचित संचय के बाद भी काफी अधिक बचने लगा, तो एक और सुन्दर कहावत मायने रखती है “पानी बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम, दौउ हाथ उलिचिये, यही सयानो काम” अर्थात यदि नाव में पानी रिसकर बढ़ने लगे और घर में आवश्यकता से कही अधिक धन आने लगे तो उसे बाहर निकाल देना चाहिए (धन का दान आदि सदुपयोग) अन्यथा इसके बहुत अधिक दुष्परिणाम होते हैं!

◆दुःख के प्रमुख कारण बाहरी परिस्थितियाँ, आसपास के व्यक्तियों का व्यवहार, महत्वाकांक्षाएँ एवं कामनाएँ हैं जीवन में आई प्रतिकूल परिस्थितियों एवं समस्याओं के लिए कोई दूसरा व्यक्ति या भाग्य दोषी नहीं है उसके लिए हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं, हमारे कर्मों और व्यवहार की वजह से ही परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सामने वाले व्यक्ति का व्यवहार हमारे व्यवहार को प्रभावित न करें हम अपने स्वभाव के अनुकूल क्रिया करें मैं', 'मेरा', 'मेरे लिए' शब्दों का कम से कम प्रयोग होना चाहिए अभी कुछ कमी है और कुछ चाहिए, यह सोचकर दुःख बढ़ता है अपने काम और अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन ही चिंता का विषय हो, परिणाम नहीं ऊर्जा का उपयोग काम में हो, परिणाम में नहीं स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में मन की शांति नहीं खोना चाहिए परिस्थितियाँ, लोगों का व्यवहार, हम नहीं चुन सकते, पर कामनाओं पर नियंत्रण रख सकते हैं हम तनाव या समस्या की उत्पत्ति का कारण जानें उचित निवारण का प्रयास करें दीर्घकालीन तनाव शरीर और मन के लिए घातक है जो बदला नहीं जा सकता, उसको स्वीकार करें, यही उपाय है!

◆दूसरों को बदलना कठिन है, स्वयं को बदलने का प्रयास करें यथासंभव दूसरों की सहायता करें सब मेरे ही हैं, यह सोचें। दोषों की उपेक्षा करें भूतकाल से शिक्षा लें, वर्तमान में जिएँ व भविष्य की दुश्चिंता न करें व्यायाम, योग, प्राणायाम, ध्यान इनका अवश्य लाभ लें गहरी श्वास लेने से मन शांत होगा!

◆ एवं रात्रि प्रार्थना अवश्य करें ईश्वर को धन्यवाद दें व्यर्थ विवाद एवं नकारात्मक विचार टाले जाएँ तो बेहतर है भोजन प्रसाद समझकर ग्रहण करें आहार की मात्रा उचित हो भरपेट से थोड़ा कम खाने का अभ्यास करें कम से कम बोलना एवं अधिक सुनना समस्याएँ कम करने में सहायक सिद्ध होगा तभी बोलें जब उससे सुनने वाले का हित हो अपशब्द ग्रहण न करें दूसरों से कम अपेक्षाएँ रखें अशांति के अवसर कम होंगे पदार्थ हमें आनंद नहीं दे सकते, आनंद तो मन की अवस्था है स्वयं को सदा सकारात्मक सुझाव देते रहें मन पर अशांति के बादल न छाने पाएँ आप शांत हैं तो अपना काम कुशलतापूर्वक कर पाएँगे मैं शरीर नहीं, यह मेरा निवास मात्र है, यही विचार शांति देगा!

◆दुःख को शिक्षक समझें उससे सीख लें तनाव एवं समस्याएँ ही हमारे मन को जागृत रखते हैं समाधान खोजते समय अनजाने हमारा व्यक्तित्व निखरता है जैसे सोने में खोट मिलाए बिना आभूषण नहीं बनते, ऐसे ही समस्या सुलझाने से आत्मविश्वास बढ़ता है अतः यही जीवन का सुख,दुख है.!

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