आज नैतिक मूल्य काफ़ी नीजे गिर चुके है!

प्र●1● आज नैतिक मूल्य काफ़ी नीजे गिर चुके है!

18,june,2018

◆ किसी भी समाज में अनैतिकता हो नाईसाफी से मेरा जन्म लेती है लालची और स्वार्थी लोग जो गलत फालतू की तलाश में रहते हैं उन पर नैतिक चरित्र वाले लोगों द्वारा अंकुश लगाना जरूरी है हम जिंदगी के रास्ते से भटक गए हैं!

◆ कोई भी समाज अपने अपने सिद्धांत को खो दिया है वन विनाश की ओर बढ़ रहा है इतिहास गवाह है कि जब भी नैतिक मूल्य और सिद्धांत गिरे तो समाज की गिर गया है!

◆ लगभग 50या 60 साल पहले अमेरिका जबरदस्त मंदी के दौर से गुजर रहा था फोन की एक तिहाई बोले कुछ ही महीनों में बर्बाद हो चुकी थी उत्पादन में 70% की गिरावट आ रही थी एक चौथाई मजदूर कार्ड हो गए थे घरों में स्कूल चलाना भी मुश्किल हो गया था युवक के 20% स्कूल स्टूडेंट को शिकार हो चुके थे एक समय तो 34 मिलियन आदमी औरत और बच्चे बगैर किसी  आमदानी के थे!

◆ फिर भी इन सारी मुश्किलों के दिनों में भूख तकलीफ और पीड़ा के बीच फैंकलिन रूज़वेल्ट ने अपने राष्ट्र के लोगों से रेडियो पर कहा ईश्वर का शुक्र है कि हमारी मुश्किलें सिर्फ भौतिक को संसारिक चीजों को लेकर है!

◆यह सत्य है कि अशिष्टता अनैतिकता को जन्म देती है। मानव चरित्र को नैतिकता का पर्याय कहा जाता है। सत्यवादिता, दयालुता, निष्कपटता, सदाचार, संतोष, पारस्परिक सहयोग, ये सभी नैतिकता के आधार बिंदु हैं। जिस व्यक्ति में ये गुण होंगे, वह निश्चय ही नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरेगा। यही नैतिक मूल्य हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान हैं। पुरखों से विरासत में मिली अनमोल धरोहर हैं। इसी नैतिकता के कारण भारत की संपूर्ण विश्व में एक अलग पहचान है। बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज की हमारी नई और आधुनिक पीढ़ी इस बेशकीमती धरोहर को खोती जा रही है। युवाओं का रुष्ट और रूखा व्यवहार, बड़ों के प्रति अनादर, कुतर्क व मनमानापन यही दर्शाता है कि युवाओं में नैतिक मूल्यों का स्तर किस हद तक गिर चुका है। अशिष्टता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि एक बार किसी विद्यालय के छात्र साइकिल रैली के लिए जमा हुए थे, वहां सम्मानित शिक्षक वर्ग भी उपस्थित था। अचानक विद्यालय का पूर्व छात्र महंगी बाइक से आया और कुछ छात्रों से झगड़ा शुरू कर दिया। जब शिक्षकों ने बीच-बचाव किया तो उन्हें गालियां दीं। यह सब करते हुए उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे, जैसे ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता हो। न जाने क्या सिद्ध करना चाहता था वह। शिक्षकों का अपमान करके शायद उसे अपनी दबंगई पर अभिमान हुआ होगा। आश्चर्य इस बात पर होता है कि यह सब छोटे से अंतराल में हुआ है। आज से कुछ दशक पूर्व अपने बड़ों का आदर करना, उन्हें उचित प्रेम देना कर्तव्य माना जाता था। लोग मिलनसार थे, रिश्तों में गर्माहट थी, लेकिन अब यह कहते हुए लज्जा आती है कि जिन बूढ़े मां-बाप ने पाल पोसकर बड़ा किया, वही मां-बाप आज बच्चों पर बोझ बन गए हैं। मोबाइल फोन में युवा इतने मग्न रहते हैं कि मेल-मिलाप के लिए वक्त ही नहीं है। आजकल फेसबुक पर बनने वाले रिश्तों के कारण गर्मजोशी का सवाल ही बेमानी है। हमारे देश में नैतिक मूल्यों की रिक्तता देखने को मिल रही है। पश्चिम के अंधानुकरण के कारण हमारी संस्कृति के लुप्त होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। हमारी कथनी और करनी में भारी अंतर आ गया है। आज नैतिक मूल्यों की चर्चा केवल पुस्तकों, भाषणों, गोष्ठियों या फिर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में की जाती है। हम अपने प्राचीन आदर्शो को भूलते जा रहे हैं, जिसके कारण हम स्वयं ही अपने बल, बुद्धि और वैभव को अपने हाथों से खो बैठे हैं। नैतिक मूल्यों का पतन होने का दुष्परिणाम है कि हमारा समाज पतन के गर्त में गिरता जा रहा है। संवेदनहीनता की हद तो इस बात से आंकी जा सकती है कि सड़क पर तड़पते हुए घायल की जान बचाने के बजाए हमारे युवा उसकी दर्दनाक तस्वीर अपने स्मार्ट फोन में कैद करने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, ताकि उसे सोशल साइट पर अपलोड कर सकें और बाकी के युवक संवेदनहीनता का स्वांग रचते हुए बड़ी फुर्ती से उस पर लाइक या कमेंट्स करे। आज का युवा वर्ग पल भर में ही वह सब कुछ पाना चाहता है, जो न ही उनके लिए उचित है और न ही उसका अभी वक्त आया है। शराब, पैसा, अय्याशी को हासिल करने के लिए शार्टकट भी अपनाता है। ऐशो-आराम की महत्वाकांक्षा इतनी अधिक बढ़ गई है कि जब भी किसी युवा से पूछा जाता है कि तुम्हारा सपना क्या है तो हर बार यही जवाब मिलता है कि पैसा। जैसे जीवन में सबकुछ पैसा ही हो गया है। इसके लिए कुछ भी कर गुजरने की ललक उनके चेहरों पर साफ झलकती है। समाचार पत्रों के माध्यम से रोज ही ऐसे कितने समाचार पढ़ने को मिलते हैं कि युवा किस हद तक खुद को भुला चुके हैं। सबसे अधिक तकलीफ तो इस बात की होती है कि उन्हें न तो इसकी भनक है और न ही अफसोस। किसी पागल हाथी के समान अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते-कुचलते हुए वे आसमानों में उड़ रहे हैं, इस बात से बेखबर कि जब वह जमीन पर गिरेंगे तो कितना बुरा हश्र होगा!

◆नैतिकता का सम्बंध मानवीय अभिवृत्ति से है, इसलिए शिक्षा से इसका महत्त्वपूर्ण अभिन्न व अटूट सम्बंध है. कौशलों व दक्षताओं की अपेक्षा अभिवृत्ति-मूलक प्रवृत्तियों के विकास में पर्यावरणीय घटकों का विशेष योगदान होता है. यदि बच्चों के परिवेश में नैतिकता के तत्त्व पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं तो परिवेश में जिन तत्त्वों की प्रधानता होगी वे जीवन का अंश बन जायेंगे. इसीलिए कहा जाता है कि मूल्य पढ़ाये नहीं जाते, अधिग्रहीत किये जाते हैं.!

◆देश की सबसे बड़ी शैक्षिक संस्था-राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के द्वारा उन मूल्यों की एक सूची तैयार की गयी है जो व्यक्ति में नैतिक मूल्यों के परिचायक हो सकते हैं. इस सूची में 84 मूल्यों को सम्मिलित किया गया है.!

◆वास्तव में, नैतिक गुणों की कोई एक पूर्ण सूची तैयार नहीं की जा सकती, तथापि संक्षेप में हम इतना कह सकते हैं कि हम उन गुणों को नैतिक कह सकते हैं जो व्यक्ति के स्वयं के, सर्वांगीण विकास और कल्याण में योगदान देने के साथ-साथ किसी अन्य के विकास और कल्याण में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाए. विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि नैतिक मूल्यों की जननी नैतिकता सद्गुणों का समन्वय मात्र नहीं है, अपितु यह एक व्यापक गुण है जिसका प्रभाव मनुष्य के समस्त क्रिया- कलापों पर होता है और सम्पूर्ण व्यक्तित्व इससे प्रभावित होता है. वास्तव में नैतिक मूल्य/नैतिकता आचरण की संहिता है. हमें इस बात को भली भांति समझना होगा कि नैतिक मूल्य नितांत वैयक्तिक होते हैं. अपने प्रस्फुटन उन्नयन व क्रियान्वय से यह क्रमश अंतयक्तिक-सामाजिक व सार्वभौमिक होते जाते हैं.!

◆एक ही समाज में विभिन्न कालों में नैतिक संहिता भी बदल जाती है. नैतिकता-नैतिक मूल्य वास्तव में ऐसी सामाजिक अवधारणा है जिसका मूल्यांकन किया जा सकता है. यह कर्तव्य की आंतरिक भावना है और उन आचरण के प्रतिमानों का समन्वित रूप है जिसके आधार पर सत्य असत्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का निर्णय किया जा सकता है और यह विवेक के बल से संचालित होती है.!

◆आधुनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता, महत्त्व अनिवार्यता व अपरिहार्यता को इस बात से सरलता व संक्षिप्ता में समझा जा सकता है कि संसार   के दार्शनिकों, समाजशात्रियों, मनोवैज्ञानिकों शिक्षा शात्रियों, नीति शात्रियों ने नैतिकता को मानव के लिए एक आवश्यक गुण माना है.!

◆खेद का विषय है कि हमारी शिक्षा केवल बौद्धिक विकास पर ध्यान देती है. हमारी शिक्षा शिक्षार्थी में बोध जाग्रत नहीं करती वह जिज्ञासा नहीं जगाती जो स्वयं सत्य को खोजने के लिए प्रेरित करे और आत्मज्ञान की ओर ले जाये, सही शिक्षा वही हो सकती है जो शिक्षार्थी में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित कर सके.!

नैतिकता मनुष्य के सम्यक जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है. इसके अभाव में मानव का सामूहिक जीवन कठिन हो जाता है. नैतिकता से उत्पन्न नैतिक मूल्य मानव की ही विशेषता है. नैतिक मूल्य ही व्यक्ति को मानव होने की श्रेणी प्रदान करते हैं. इनके आधार पर ही मनुष्य सामाजिक जानवर से ऊपर उठ कर नैतिक अथवा मानवीय प्राणी कहलाता है. अच्छा-बुरा, सही गलत के मापदण्ड पर ही व्यक्ति, वस्तु, व्यवहार व घटना की परख की जाती है. ये मानदंड ही मूल्य कहलाते हैं. और भारतीय परम्परा में ये मूल्य ही धर्म कहलाता है अर्थात ‘धर्म’ उन शाश्वत मूल्यों का नाम है जिनकी मन, वचन, कर्म की सत्य अभिव्यक्ति से ही मनुष्य मनुष्य कहलाता है अन्यथा उसमें और पशु में भला क्या अंतर? धर्म का अभिप्राय है मानवोचित आचरण संहिता. यह आचरण संहिता ही नैतिकता है और इस नैतिकता के मापदंड ही नैतिक मूल्य हैं. नैतिक मूल्यों के अभाव में कोई भी व्यक्ति, समाज या देश निश्चित रूप से पतनोन्मुख हो जायेगा. नैतिक मूल्य मनुष्य के विवेक में स्थित, आंतरिक व अंतः र्स्फूत तत्त्व हैं जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में आधार का कार्य करते हैं,!

◆नैतिक मूल्यों का विस्तार व्यक्ति से विश्व तक, जीवन के सभी क्षेत्रों में होता है. व्यक्ति-परिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र से मानवता तक नैतिक मूल्यों की यात्रा होती है. नैतिक मूल्यों के महत्त्व को व्यक्ति समाज राष्ट्र व विश्व की दृष्टियों से देखा समझा जा सकता है. समाजिक जीवन में तेज़ी से हो रहे परिवर्तन के कारण उत्पन्न समस्याओं की चुनौतियों से निपटने के लिए और नवीन व प्राचीन के मध्य स्वस्थ अंतः क्रिया को सम्भव बनाने में नैतिक मूल्य सेतु-हेतु का कार्य करते हैं. नैतिक मूल्यों के कारण ही समाज में संगठनकारी शक्तियां व प्रक्रिया गति पाती हैं और विघटनकारी शक्तियों का क्षय होता है.!

◆नैतिकता समाज सामाजिक जीवन के सुगम बनाती है और समाज में अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण रखती है. समाज राष्ट्र में एकीकरण और अस्मिता की रक्षा नैतिकता के अभाव में नही•!

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