एक बुजुर्ग का प्यार आशीर्वाद सदा हम पर महत्त्व रहता है

प्र●1● बडे बुजुर्गों का प्यार आशीर्वाद सदा हम पर बना रहे एक खूबसूरत सी कहानी!
23,may,2018

◆बड़े बुजुर्गों का महत्व >एक प्यारी कहानी >बड़ों का आदर कहानी बड़े बुजुर्गों के महत्व को समझ कर हमें उन्हें सम्मान देना चाहिए वो बुजुर्ग हमारी धरोहर है. हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं बडे बुजुर्गों का प्यार आशीर्वाद सदा हम पर बना रहे एक खूबसूरत सी कहानी बड़े बुजुर्गों का महत्व एक प्यारी कहानी नेट पर पढी ये खूबसूरत कहानी एक पिता ने अपने पुत्र की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की उसे अच्छी तरह से पढ़ाया, लिखाया, वह पुत्र एक सफल इंसान बना पिता अब बूढा हो चला था एक दिन पिता को पुत्र से मिलने की इच्छा हुई और वो पुत्र से मिलने उसके ऑफिस में गया वहां उसने देखा कि उसका पुत्र एक शानदार ऑफिस का अधिकारी बना हुआ है, उसके ऑफिस में सैंकड़ो कर्मचारी उसके अनदार कार्य कर रहे है ये सब देख कर पिता का सीना गर्व से फूल गया  वो चुपके से उसके चेंबर में पीछे से जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया और प्यार से अपने पुत्र से पूछा "इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है" पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया उनकी आँखे छलछला आई वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे  उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है पुत्र ने इस बार कहा "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान " पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुए कहा "पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया सच है जिस के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है, वो इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान होता है  सदैव बुजुर्गों का सम्मान करें! हमारी सफलता के पीछे वे ही हैं बडे बुजुर्गों का प्यार आशीर्वाद सदा हम पर बना रहे , एक खूबसूरत सी कहानी , बुजुर्ग हमारी धरोहर, बुजुर्ग हमारी धरोहर , बुजुर्गों की अहमियत होती है!

◆आदर के साथ पेश आना जो लोग धार्मिक सेवा करते हैं, उनसे यह उम्मीद की जाती है कि उनका पहनावा सलीकेदार हो और वे सभी के साथ अच्छा बर्ताव करें। बनाव-श्रृंगार के मामले में क्या सही है और क्या नहीं, इसका हर जगह एक ही स्तर नहीं होता कुछ जगहों पर सिर पर टोपी पहने या एक हाथ जेब में रखे हुए किसी से बात करना अपमान की बात समझा जाता है, जबकि दूसरी जगहों पर इसे बुरा नहीं माना जाता। इसलिए अपने इलाके के लोगों की भावनाओं का ध्यान रखकर उनके साथ पेश आइए ताकि उन्हें कोई ठेस न पहुँचे। तब आपके सामने ऐसे हालात पैदा नहीं होंगे जो सुसमाचार सुनाने में आपके लिए रुकावट बन सकते हैं!

◆यही बात, दूसरों को और खासकर बुज़ुर्गों को संबोधित करने के बारे में भी सच है अगर बच्चे और जवान, बड़ों को नाम लेकर बुलाते हैं तो ज़्यादातर लोग इसे बदतमीज़ी समझते हैं दूसरी तरफ, अगर बड़े नाम से बुलाने की इजाज़त देते हैं, तब बच्चे और जवान ऐसा कर सकते हैं कुछ जगहों पर बड़ों का भी अजनबियों को नाम से बुलाना बेअदबी माना जाता है और बहुत-सी भाषाओं में, उम्र में बड़े लोगों या अधिकारियों से बात करते वक्‍त उन्हें इज़्ज़त देने के लिए “आप” शब्द इस्तेमाल किया जाता है या ऐसा ही कोई तरीका अपनाया जाता है!

◆आदर के साथ अपनी बात कहना। बाइबल हमसे दूसरों को अपनी आशा का कारण समझाते वक्‍त “विनम्रता और आदर के साथ” पेश आने की गुज़ारिश करती है। (1 पत. 3:16, ईज़ी-टू-रीड वर्शन) जब प्रचार में सामनेवाला अपनी राय बताता है, तब हो सकता है कि हम फौरन दिखा दें कि वह जो मानता है, उसमें क्या-क्या नुक्स हैं, लेकिन क्या उसे शर्मिंदा करके यह सब बताना ठीक रहेगा? ऐसा करने के बजाय, कितना अच्छा होगा अगर हम धीरज से उसकी पूरी बात सुनें, हो सके तो पूछें कि उसके ऐसा सोचने की वजह क्या है और फिर उसकी भावनाओं का लिहाज़ करते हुए बाइबल से तर्क देकर उसे समझाएँ!

◆जैसे एक अकेले शख्स से बात करते वक्‍त हम आदर से पेश आते हैं, वैसे ही स्टेज से बोलते वक्‍त भी हमें सुननेवालों के साथ आदर से पेश आना चाहिए। अपने सुननेवालों का आदर करनेवाला वक्‍ता उनकी कड़ी निंदा नहीं करेगा, ना ही ऐसे बात करेगा मानो कह रहा हो: “अगर आप चाहते तो ऐसा कर सकते थे इस तरह बात करने से लोगों की हिम्मत टूट जाएगी इसलिए कितना अच्छा होगा अगर हम ऐसा सोचें कि हमारे सुननेवाले ऐसे लोगों का झुंड हैं जो यहोवा से प्यार करते हैं और उसकी सेवा करने की इच्छा रखते हैं! यीशु की मिसाल पर चलते हुए हमें ऐसे लोगों के साथ प्यार से पेश आना चाहिए जो आध्यात्मिक तरीके से कमज़ोर हैं, जिन्हें ज़्यादा तजुर्बा नहीं है या जो बाइबल की सलाह पर अमल करने में वक्‍त लगाते हैं!

◆अगर वक्‍ता की बातों से ज़ाहिर हो कि खुद उसे भी परमेश्‍वर के वचन पर और अच्छी तरह अमल करने की ज़रूरत है, तो सुननेवाले समझ पाएँगे कि वह उनका लिहाज़ करता है। इसलिए आयतों को लागू करते वक्‍त बार-बार “आप” या “आपको” जैसे शब्द इस्तेमाल ना ही करें, तो अच्छा होगा। मिसाल के लिए, ध्यान दीजिए कि इस सवाल में, “क्या आप पूरी कोशिश कर रहे हैं और इस वाक्य में क्या फर्क है, “हममें से हरेक को खुद से पूछना चाहिए: ‘क्या मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ दोनों सवालों का मतलब एक ही है, मगर पहला तरीका यह दिखाता है कि वक्‍ता खुद को सुननेवालों से ऊँचे दर्जे का समझता है। जबकि दूसरे तरीके में हरेक को, यहाँ तक कि वक्‍ता को भी अपनी हालत और अपने इरादों को जाँचने का बढ़ावा मिलता है!

◆सुननेवालों को बस हँसाने के इरादे से उन्हें कुछ मज़ेदार बातें बताने की इच्छा पर काबू पाइए। बाइबल के गौरवपूर्ण संदेश के साथ ऐसा करना शोभा नहीं देता यह सच है कि हमें परमेश्‍वर की सेवा, खुशी-खुशी करनी चाहिए। और यह भी हो सकता है कि हमें अपने भाग के लिए जो जानकारी सौंपी गयी है, उसमें कुछ हँसी की बातें हों। लेकिन जब हमें कोई गंभीर बात बतानी होती है, तब उसे अगर हम मज़ाकिया अंदाज़ में कहें, तो इससे ज़ाहिर होगा कि हम न तो सुननेवालों का और ना ही परमेश्‍वर का आदर करते हैं!

◆【हमारे तौर-तरीके, व्यवहार और हमारी बोली से हमेशा यही ज़ाहिर हो कि हमने लोगों को उसी नज़र से देखना सीखा है जिस नज़र से परमेश्‍वर ने हमें सिखाया है!】

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