कौन है देवी लक्ष्मी मां.।

प्र●ना करें देवी लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा, मिल सकता है विपरीत परिणाम
1●विशिष्ट स्थान>
हिन्दू धर्म में हर देवी-देवता को एक अलग और विशिष्ट स्थान प्रदान किया गया है। साथ ही यह भी मान्यता है कि ये सभी देवी-देवता मनुष्य की अलग-अलग मनोकामनाओं को पूरा कर उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
2●पाप कृत्यों का प्रायश्चित>
अकसर आपने देखा होगा जो व्यक्ति अपने पाप कृत्यों का प्रायश्चित करना चाहता है वह भगवान शिव की पूजा करता है, ऐसा इसलिए क्योंकि शिव को भोलेनाथ कहा जाता है और वह बहुत ही जल्द अपने भक्तों की आस्था से प्रसन्न होकर उन्हें किए गए पापों की माफी दे देते हैं।
3●हनुमत आराधना>
वहीं दूसरी ओर वे लोग जो कुंडली में बैठे राहु-केतु-शनि जैसे ग्रहों के दुष्प्रभाव से खुद को बचाए रखना चाहते हैं वे हनुमान जी की आराधना करते हैं। इसके पीछे भी यह मान्यता है कि हनुमत आराधना ही बड़े से बड़े कष्टों से मुक्ति दिलवा सकती है।
4●गणेश जी>
वहीं जीवन में शुभता की चाह रखने वाले और साथ ही किसी नए काम में सफलता पाने के उद्देश्य से लोग विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा करते हैं, ताकि उनके जीवन में कोई विघ्न ना आने पाए।
5●देवी लक्ष्मी>
वहीं देवी लक्ष्मी को धन की देवी कहा गया है, इसलिए जो लोग धन पाने की कामना करते हैं, यश और समृद्धि की उम्मीद करते हैं वे लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं।
6●आर्थिक कष्ट>
माना जाता है देवी लक्ष्मी अपने भक्तों को कभी खाली हाथ नहीं लौटातीं और उनके जीवन के आर्थिक कष्टों को दूर करती हैं। देवी-देवता का कोई भी स्वरूप हो, उनकी पूजा करना मनुष्य के जीवन को सहज बनाता है, लेकिन क्या वाकई?
7●लक्ष्मी का स्वरूप>
पुराणों के अनुसार देवी लक्ष्मी का एक स्वरूप ऐसा भी है जिसकी पूजा करना आपके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। निश्चित तौर पर आपको हमारी बात का यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन यह शत-प्रतिशत सच है।
8●लक्ष्मी पूजा>
माना जाता है कि अगर लक्ष्मी जी की पूजा में किसी भी प्रकार की अनदेखी की जाए तो यह नुकसान पहुंचा सकती है।
9●उल्लू की सवारी>
ऐसी मान्यता है कि देवी लक्ष्मी का वो स्वरूप जिस पर वह उल्लू की सवारी कर रही हों, उसकी पूजा करना धन लाभ की जगह धन हानि करवाता है।
10●धन>
अगर आपको धन प्राप्त हो भी जाए तो भी वह किसी अच्छे कार्य में खर्च ना होकर व्यर्थ का ही खर्चा तैयार कर देगा।
11●लक्ष्मी का वाहन>
उल्लू को लक्ष्मी का वाहन माना गया है, जो अंधेरे का जीवन है। उल्लू स्वभाव से चंचल तो है लेकिन इसे अज्ञानता और अंधकार का भी प्रतीक माना गया है।
12●पूजा>
लक्ष्मी के उल्लू की सवारी करते हुए स्वरूप में लक्ष्मी को चंचल माना गया है। अगर इस स्वरूप की पूजा की जाए तो लक्ष्मी उसके पास आती तो है लेकिन ठहरती नहीं है।
13●विष्णु जी>
वहीं अगर लक्ष्मी जी के उस स्वरूप की पूजा की जाए जिसमें वो विष्णु जी के साथ गरुड़ की सवारी कर रही हों तो लक्ष्मी जी घर में आती भी हैं और वास भी करती हैं। इसलिए इस स्वरूप की आराधना करना शुभ माना गया है।
14●सबसे उपयुक्त>
अगर आपको अपने घर या दुकान पर लक्ष्मी जी की मूर्ति या तस्वीर लगानी हो तो ऐसी तस्वीर लगानी चाहिए जिसमें देवी लक्ष्मी कमल के फूल पर विराजमान हों। इसे सबसे उपयुक्त माना गया है।
प्र●लक्ष्मी पूजन कारण.।
धन, संपत्ति अर्थात पैसा वर्तमान में मनुष्य की सबसे बड़ी जरुरत है। पैसे से ही मनुष्य के जीवन की तमाम भौतिक जरुरतें पूरी होती हैं। धन, संपत्ती, समृद्धि का एक नाम लक्ष्मी भी है। लक्ष्मी जो कि भगवान विष्णु की पत्नी हैं। मान्यता है कि मां लक्ष्मी की कृपा से ही घर में धन, संपत्ती समृद्धि आती है। जिस घर में मां लक्ष्मी का वास नहीं होता वहां दरिद्रता घर कर लेती है। इसलिये मां लक्ष्मी का प्रसन्न होना बहुत जरुरी माना जाता है और उन्हें प्रसन्न करने के लिये की जाती है मां लक्ष्मी की पूजा। आइये आपको बताते हैं कि क्या है लक्ष्मी पूजन की विधि और पूजा के के लिये चाहिये कौनसी सामग्री?

प्र●कौन हैं लक्ष्मी.।
देवी लक्ष्मी को धन और सम्रद्धि की देवी कहा जाता है। सनातन धर्म के विष्णु पुराण में बताया गया है कि लक्ष्मी जी भृगु और ख्वाती की पुत्री हैं और स्वर्ग में यह वास करती थी। समुद्रमंथन के समय लक्ष्मी जी की महिमा का व्याख्यान वेदों में बताया गया है। लक्ष्मी जी ने विष्णु जी को अपने पति के रुप में वरण किया जिससे इनकी शक्तियां और प्रबल हुई मानी जाती हैं लक्ष्मी का अभिषेक दो हाथी करते हैं। वह कमल के आसन पर विराजमान है। लक्ष्मी जी के पूजन में कमल का विशेष महत्त्व बताया गया है। क्योकि यह फूल कोमलता का प्रतीक है इसलिए माँ लक्ष्मी जी की पूजा में इसका स्थान आता है। लक्ष्मी जी के चार हाथ बताये गये हैं। वे एक लक्ष्य और चार प्रकृतियों दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति के प्रतीक हैं और माँ लक्ष्मी जी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। इनका वाहन उल्लू को बताया गया है जो निर्भीकता का सूचक है माँ लक्ष्मी जी की मुख्य पूजा तो वैसे दिवाली पर की जाती है किन्तु लक्ष्मी पूजा निरंतर करना, और भी ज्यादा फलदायक माना जाता है।
प्र●लक्ष्मी पूजन के लिये सामग्री>
मां लक्ष्मी की पूजा के लिये सामग्री अपने सामर्थ्य के अनुसार जुटा सकते हैं। मां लक्ष्मी को जो वस्तुएं प्रिय हैं उनमें लाल, गुलाबी या फिर पीले रंग का रेशमी वस्त्र लिया जा सकता है। कमल और गुलाब के फूल भी मां को बहुत प्रिय हैं। फल के रुप में श्री फल, सीताफल, बेर, अनार और सिंघाड़े भी मां को पसंद हैं। अनाज में चावल घर में बनी शुद्ध मिठाई, हलवा, शिरा का नैवेद्य उपयुक्त है। दिया जलाने के लिये गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा पूजन में रोली, कुमकुम, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, चौकी, कलश, मां लक्ष्मी व भगवान श्री गणेश जी की प्रतिमा या चित्र, आसन, थाली, चांदी का सिक्का, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, दीपक, रुई, मौली, नारियल, शहद, दही गंगाजल, गुड़, धनियां, जौ, गेंहू, दुर्वा, चंदन, सिंदूर, सुगंध के लिये केवड़ा, गुलाब अथवा चंदन के इत्र ले सकते हैं।
प्र●पूजा की विधि>
सबसे पहले पूजा के जलपात्र से थोड़ा जल लेकर मूर्तियों के ऊपर छिड़कें इससे मूर्तियों का पवित्रकरण हो जायेगा, इसके पश्चात स्वयं को, पूजा सामग्री एवं अपने आसन को भी पवित्र करें। पवित्रीकरण के दौराण निम्न मंत्र का जाप करें जैसे....
ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।
य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।
इसके बाद जिस जगह पर आसन बिछा है उस जगह को भी पवित्र करें और मां पृथ्वी को प्रणाम करें। इस प्रक्रिया में निम्न मंत्र का उच्चारण करें जैसे....
पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
अब पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और ॐ केशवाय नमः मंत्र बोलिये इसके बाद फिर एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए और ॐ नारायणाय नमः मंत्र का उच्चारण करें इसी तरह तीसरी बूंद मुंह में डालकर ॐ वासुदेवाय नमः मंत्र बोलें। फिर ॐ हृषिकेशाय नमः  कहते हुए हाथों को खोलें, अंगूठे के मूल से होठों पोंछ कर हाथों को धो लें। इस प्रक्रिया को आचमन कहते हैं इससे विद्या, आत्म और बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है। तत्पश्चात तिलक लगाकर अंग न्यास करें। अब आप पूजा के लिये पूरी तरह पवित्र हैं इसके बाद मन को एकाग्र व प्रभु में ध्यान लगाने के लिये प्राणायाम करें या आंखें बंद कर मन को स्थिर कर तीन बार गहरी सांस लें। पूजा के आरंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है इसके लिये हाथ में पुष्प, अक्षत और जल लेकर स्वतिन: इंद्र आदि वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए ईश्वर को प्रणाम किया जाता है। किसी भी पूजा को करने में संकल्प प्रधान होता है इसलिये इसके बाद संकल्प करें.संकल्प के लिये हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लें साथ में कुछ द्रव्य यानि पैसे भी लें अब हाथ में लेकर संकल्प मंत्र का उच्चारण करें फिर पूजा सामग्री चढायें। फिर नवग्रहों की पूजा करें, इसके लिये हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर नवग्रह स्तोत्र बोलें। तत्पश्चात भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन करें।  माताओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन करें। रक्षाबंधन के लिये मौलि लेकर भगवान गणपति पर चढाइये फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिये और तिलक लगा लें। इसके बाद महालक्ष्मी की पूजा करें माँ लक्ष्मी जी की पूजा के लिए वेदों में कई महत्वपूर्ण मन्त्र दिये गये हैं। ऋग्वेद में एक जगह माँ लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए निम्न मंत्र का उल्लेख किया गया है....
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमस्तु ते।।
अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे।।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ।।
लक्ष्मी जी की पूजा करते वक़्त साफ़-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये। दीपावली के अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा के बाद दीपक पूजन करें इसके लिये तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा ज्यादा दीपक प्रज्जवलित कर एक थाली में रखकर पूजा करें।
दीपक पूजन के बाद घर की महिलायें अपने हाथ से सोने-चांदी के समस्त आभूषण इत्यादि को मां लक्ष्मी को अर्पित कर दें। अगले दिन स्नान के बाद विधि-विधान से पूजा के बाद आभूषण एवं सुहाग की अन्य सामग्री जो अर्पित की थी उसे मां लक्ष्मी का प्रसाद समझकर स्वयं प्रयोग करें। मान्यता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा सदा बनी रहती है.।

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