दिल में रहना सीखो घर में तो सब रहते हैं...।

एक बार की बात है जब एक गांव में एक इंसान देता था वह एक बारदो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी
या है मोहब्बत या है जवानी दिल की बातों का मतलब ना पूछो कुछ और हम से बस अब ना पूछो जिस के लिए है दुनिया दीवानी या है मोहब्बत या है  अपने विचार को लेकर और अपने संघर्ष और अपनी दिल के पास रहने वाली सानू के लिए भी भी इतना ही दर्द भरा सवाल करता था जबकि उसे पता था कि दुनिया में लोग दर्द से नहीं अपने विचार के संघर्ष से प्यार करते हैं जो इंसान घर से निकल कर बाहर ना जाए वह इंसान किस काम का दुनिया देखो संघर्ष होगा विचार बढ़ेंगे आत्मविश्वास होगा जबकि हमें पता है कि दुनिया अपने काम से बिकती हैं जबकि हमें बताना है कि दिल से दिल नहीं लगाया जाता तो फिर किससे लगाते हैं हमें हमारे गांव या दूसरे गांव या शहर सबसे सही तरह का विचार से बात करो भरोसा मिलेगा आत्मविश्वास और अपना संघर्ष भी होगा जिस तरह हमने अपनेकभी राज-ए-मोहब्बत छूप नहीं सकता छुपाने से ये वो तूफान है जो और उभरेगा दबाने से मेरे सरकार, जिस उलझन को लेकर आये हो दिल में वो उलझन जान ली हम ने, तुम्हारे सर झुकाने से दिल की कहानी रंग लाई है हल्की हल्की, आँखे हैं छलकी छलकी आज तो जाँ पे बन आई हैकिसी को भी मोहब्बत के ना फंदे में खुदा डाले ये जब चाहे बना डाले, ये जब चाहे मिटा डाले कोई इसका भरोसा है, ना कुछ इसका ठिकाना है किसी को जिंदगी दे दे, किसी का घर जला डाले क्योंकि हमेशा जिन्दगी खेलते हैं इश्क के मारे ये अपनी अपनी किस्मत है, कोई जीते कोई हारे अरे तोबा, ये दस्तूर-ए-मोहब्बत भी कयामत है रहो खामोश तो दिल को जलाये गम के अंगारे और आहें भरे तो रुसवाई है. जब उसने सोचा कि मैंने घर वाले को सच बात नहीं बताए तो यह मुझे बार बार घर से बाहर जाने का ही बोलेंगे फिर एक दिन उसने. रात में वह ठीक से सोती भी नहीं ओह! यह बात है.” मेरे मन में भी बहुत सारी बातें उठीं, लेकिन मैं चुप रही. रिया का घर के कामों में मन न लगना, अकेले रहने की बात करना, फिर अचानक एक सुखद परिवर्तन, लेकिन यह परिवर्तन भी उसकी भाभी के अलगाववादी नीतियों के कारण हुआ, जो ठीक नहीं था. रिया ने जो कुछ यहां किया था, वही सब कुछ जब उसकी भाभी ने किया, तो वह परेशान हो गई.मैंने चुप्पी साध ली थी. रिया स्वयं मेरे नज़दीक आने की कोशिश करने लगी. स्कूल और घर दोनों संभालनेवाली बहू के प्रति मेरे मन में सहानुभूूति उमड़ने लगी. मैं उससे बोलने-बतियाने लगी. वही सारी बातें जब उसने मुझे बताईं, तो मैंने उसे समझाया कि यह सब कुछ दिनों की मुश्किलें हैं. कटुता कम होने पर सब ठीक हो जाएगा.नहीं मम्मीजी! भाभी मेरे बूढ़े मां-बाप को छोड़कर जाने की बात कहने लगी हैं. भइया की सैलरी से ही तो घर चलता है. भाभी मुझे अपने दोनों बच्चों बंटी-नेहा जैसा मानती थीं, इसीलिए तो मैं भी मायके से जुड़ी थी, अब न जाने क्यों उनमें ऐसा परिवर्तन आ गया. मुझे भी आप सबसे न निभा पाने का ताना देती रहती हैं.मैंने उसे दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रखा, तो वह मुझसे लिपट गई. मेरा मन भीग गया. लगा रागिनी मेरे गले लगकर खड़ी है.
“मम्मीजी, मैंने भी इस घर और आप सबके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया. यह नहीं सोच पाई कि मैं जो कुछ अपनी भाभी से अपेक्षा कर रही हूं, वैसी ही आशा आप सब भी मुझसे करते होंगे. जीवन का केवल एक पक्ष देखा था मैंने, लेकिन अब मैं सब कुछ समझने लगी हूं.मैंने उसे सांत्वना दिया. आगे संक्षेप में यह कि अब मैं पति, पुत्र, बहू के साथ सानंद जीवनयापन कर रही थी. एकाध महीने बाद सुना कि रिया के मायके में भी सब कुछ ठीक हो गया है. रिया की भाभी ने अलग होने की रट छोड़ दी है और सास के साथ मेल-मिलाप पूर्वक रहने लगी है. उसका बार-बार रूप बदलना मुझे आश्‍चर्यजनक लगा, लेकिन एक दिन छत पर सूखे कपड़े समेटते बगल की छत पर रिया की भाभी खड़ी दिखी. उसने पूछा, “आंटीजी! घर में सब ठीक है न?”
“हां, अच्छा चल रहा है. तुम बताओ तुम्हारे परिवार में सब कुशल मंगल है न“यहां तो हमेशा ही कुशल मंगल था.लेकिन मैंने तो सुना था कि उसने होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए पास बुलाया और बोली, “हमारे परिवार में कुछ भी गड़बड़ नहीं थी. वह तो मैंने और मेरी सास ने मिलकर गृह-कलह का नाटक किया था, ताकि रिया को अपने दायित्वों का एहसास हो.मेरी आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं. स्वयं को संभालकर मैंने दबे स्वर में कहा, “बेटी! मैं किस प्रकार तुम्हें धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आ रहा है. तुमने मेरे घर की ख़ुशी के लिए स्वयं को बुरी साबित करने का प्रयास किया.कोई बात नहीं आंटी. मेरे सास-ससुर तो सब जानते हैं, अभी रिया को कुछ नहीं पता चलना चाहिए. बाद में जानने पर कुछ न होगा.तुम ठीक कह रही हो, मैं उसे कानों-कान ख़बर नहीं होने दूंगी.” और हम दोनों नीचे उतर गए.
मैं कृतज्ञ थी, ज़िंदगी की गाड़ी हंसी-ख़ुशी, ग़म-मुसीबत लिए चलती रहती है, उसमें ठहराव नहीं आता, किंतु संतोष व कृतज्ञता के भाव तब उत्पन्न होते हैं, जब कोई शख़्स निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मुश्किलें आसान करता है और गाड़ी पटरियों पर सरपट दौड़ने लगती है. जभी तो झूठ नहीं बोलना चाहिए.....|

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