कभी मन दुःख में होता है और ऐसा लगता है हम एक वीरान गहरी घाटी में खड़े हैं और चारो ओर से मुसीबतों के बड़े पहाड़ गिर रहे हैं, और उस एकांत में हमें चारो ओर अँधेरा सा लगता है, अनुभूत होता है की क्या हमारा इस संसार में कोई है और है तो अपना कौन है.
सबसे पहले हमें इस भौतिक संसार में लाने वाली माता का ध्यान आता है और फिर हमें उस शक्ति का विचार आता है जिसके अगिनत नाम हैं और कभी उसे आँखों से देखा भी नहीं फिर भी उसी का विचार आता है. मातापिता भी ईश्वर का ही एक मानवीय रूप होते हैं. पर जब हम मानवीय रिश्तों की बात करें तो उन मित्रों का विचार आता है जिन्होंने कभी बिना किसी स्वार्थ के सहायता की होती है. इस अति विकराल कलयुग में विचार करें तो संसारी रिश्तें जिन्हे हम अपना समझते हैं कुछ दूर तक ही साथ देते हैं. जब तक हम भौतिक सुखों से भरपूर जीवन जी रहे होते हैं तो संसार अपना लगता है क्यूंकि सब इतना प्रेम से मिलते हैं या कम से कम मित्रता का एक ढोंग तो करते हैं. हम समझने लगते हैं के देखो मेरे कितने मित्र हैं, कितने प्रेम करने वाले रिश्ते हैं, कितने चाहने और सम्मान करने वाले लोग हैं।
कई बार हमारे अंतरंग सम्बन्धी, पक्के मित्र जिन्हे हम "अपना" समझते थे, कुछ संकट आने पर दृष्टि फेर लेते हैं. विपत्तियां तो हर जीवन में हर मोड़ पर आने वाली हैं. लेकिन वो कौन अपने हैं जो हमारा सदैव साथ देंगे. अनुभव होने पर पता चलता है के जिन्हे हम अपना समझते थे वह हमें नहीं हमारी सम्पत्ति या अपने निजी स्वार्थ के कारण अपनापन दर्शाते थे. ऐसा नहीं की संसार में केवल ऐसे ही लोग हों, कई बार जिनसे हमारा कोई पारिवारिक सम्बन्ध नहीं भी होता और जिन्हे हम पसंद भी नहीं करते या कई बार दुत्कार देते थे, वह "दूर के जानने वाले" दुःख आने पर हमारे शुभचिंतक सिद्ध होते हैं और कई बार जिन्हे हम कभी नहीं मिले वह पराये अनदेखे लोग हमारे लिए सब कुछ करने को तैयार हो जाते हैं जबकि हमारे अपने सगे सम्बन्धी बहाने बनाकर कतराकर निकल जाते हैं. बदलती परिस्थिति में जो साथ ना दें, हम धनहीन हों, व्यापार कार्य में बाधा हो और हमें अकेला छोड़कर चला जाए वह हमारा अपना नहीं हो सकता. जो परिस्थिति के बदलने पर साथ न रहें अपने नहीं हो सकते !
हमें नहीं भूलना चाहिए की हमारा यह जन्म कर्म के लिए हुआ है इसलिए हम अपनों के लिए दिन रात श्रम कर दूसरों की सेवा करते हैं. सेवा के पीछे स्वार्थ नहीं होता. जहाँ स्वार्थ है वह सेवा नहीं उसका ढोंग है जो शायद अपने कार्य के लिए कुछ लोग करते हैं. कई बार इन्ही अपनों के मोह माया में फंसकर लोग झूठ , कपट, बेईमानी और थोड़ी बहुत धोखाधड़ी भी कर लेते हैं जिसका कभी विवेक आने पर दुःख भी करते हैं. जो भी हो एक दिन ये सब पराये, अपने या सम्बन्धी सबको छोड़ना होता है. प्रश्न है के जब शरीर छोड़ना पड़ता है, चाहें या न चाहें, ये नश्वर शरीर तो छोड़ना ही पड़ता है,आत्मा तो नश्वर नहीं वह तो सदैव हम ही थे और हम ही रहेंगे - तो आत्मा का अपनों के साथ क्या सम्बन्ध रह जाता है. जो लोग विरक्त हैं, इस बादल और मौसम की तरह बदलते संसार को समझते हैं उन्हें संसार से विदा लेते समय, मुक्त होने में कठिनाई नहीं होता, पर अधिकाँश लोग अपने सम्बन्धी, रिश्ते और जिन्हे हम अपने सगे या मित्र 'मानते' हैं के वियोग में दुखी होते हैं.
पर सत्य तो यह है की जब शरीर छूट जाता है तो सब सम्बन्ध अपने आप विच्छेद हो जाते हैं. इस जन्म के माता पिता हमें स्मरण रहते हैं क्यूंकि उन्होंने उपकार करके हमें इस संसार में जन्म दिया. लेकिन हर जन्म में मातापिता भी कोई और ही होंगे, जिनका सम्बन्ध हमारे किसी पूर्व जन्म से रहेगा या किसी भविष्य के जन्म में कर्मों के खेल और उसके फल के कारण कुछ पुराने रिश्ते फिर लौट कर आएंगे. हम सब प्राणियों को इस दृश्य जगत में रहते शरीर के पुनर्गठन के लिए रात्रि में सोना पड़ता है. जब शरीर बहुत थक जाता है स्वयम निद्रा के लिए चला जाता है. शरीर निद्रा अवस्था में इस संसार से कुछ घंटे के लिए मुक्त हो जाता है. आप देखें के उस अंतराल में सब संसार, रिश्ते, नाते, सम्बन्धी, मित्र सब कहीं खो जाते हैं. न कोई पति पत्नी न कोई पुत्र पुत्री या भाई बहिन न मित्र सब अदृश्य हो जाते हैं. तो इसका अर्थ हुआ के इस संसार को जिसे हम अपना समझे बैठे हैं, हमारा है ही नहीं. जिन सम्बन्धो के पीछे हम जान दे रहे हैं, रात दिन एक कर श्रम करते हैं केवल हमारे जाग्रत सांसारिक मन की धारणा या आस्था मात्र हैं. वह इसलिए के इनमे से कोई भी हमारे साथ स्थायी नहीं रहने वाला. सब एक दिन में देखे स्वपन की भांति एक चलचित्र है जो हमारे आसपास चल रहा है पर अज्ञात मन को यह अच्छी तरह पता है की यह सब सम्बन्ध हमारी सुभीत सुविधा के लिए "मान्य" हैं क्यूंकि हमें जीवन जीने को कोई बहाना चाहिए जैसे........
मोहब्बत की दुनिया में साहिबा का नाम विश्वास और धोखे के ताने बाने में उलझा सा प्रतीत होतो तब भी मिर्जा साहिबा का इश्क कहीं भी उन लोगों से कमतर नही माना जा सकता जिन से आज भी मोहब्बत का मयार कायम है यह और बात है की मोहब्बत करने वालों को राह में कभी आग के दरिया मिलते हैं तो कभी खून के हालांकि अक्सर मोहब्बत करने वाले हर आग में खुद को जला लेने को ही अपना ईमान सम्मान समझते हैं इस कसौटी पर खुद को कस कर ही वे लोग इश्क की शमा को सदियों से सदियों तक जलाये रहते हैं ये और बात है कि दुनिया उनके मजारों पर उनके नाम के मेले तो लगा सकती है पर उनके उस अग्निपथ पर चलना तो दूर उसे आज भी अस्पृश्य मानती है पर मोहब्बत है कि आज भी इस रास्ते पर एक बार चल पीछे मुड़ना तो दूर देखना भी गुनाह मानती है .।
साहिबा की कहानी मोहब्बत की अजीब कसौटी है जो पुरुष के अभिमान और स्त्री के आत्मसम्मान की सरहदों को छूती गुस्से जिद और चिढ के बचकानेपन से गुजरती खून के दरिया को लांघती पश्चाताप के आंसुओं में डूब अंततः मृत्यु की गोद में पनाह पाती है सच मोहब्बत करने वालों के जीवन में नियति ने क्या क्या इम्तिहान लिखे हैं हर बार हर कदम हर मोड़ पर तलवार की धार नही तलवार की नोक पर सीधे खड़े रहने की आजमाइश है कभी कभी तो लगता है कि ये नुकीली नोकें पैर को भेद कर दो टुकड़ों में काट कर साधनारत प्रेमियों को बस अभी उस ऊँचाई से गिरा डालें गी पर पता नही कैसे पता नही क्यों हर बार यही तीखी पैनी नोकें पैर का सहारा बन जाती हैं गिरने से पहले ही थाम लेती हैं पता नही क्यों पर ऐसा ही होता है!
मिर्जा और साहिबा बचपन के साथी थे. उनके परिवारों मन भी कोई मतभेद नही था जात-पात रुतबे... सामाजिक दृष्टि से दोनों समान थे. मस्जिद में मौलवी से एक साथ पढ़ते हुए मिर्जा साहिबा ने कभी अलग न होने की कसम खाई थी. मौलवी को उनके नजदीकियां पसंद नही थी.पर उन दोनों को किसी की परवाह कहाँ थी. मानव समाज हमेशा से ऐसा ही है.प्रेम को स्वीकार करना इसकी फितरत ही नही है. मिर्जा साहिबा की मोहब्बत के चर्चे भी आम हो गए. लोगों की बातों से तंग आ कर मिर्जा ने वो गाँव (झंग) ही छोड़ दिया और अपने गाँव दानाबाद चला आया ! पर साहिबा कहाँ जाती दुनिया के तानों और मिर्जा के वियोग का संताप सहती वो वहीँ बनी रही. माता पिता के सामने तो कुछ न बोलती पर भीतर ही भीतर तड़पती रहती
माता पिता ने बदनामी से तंग आ कर साहिबा का विवाह तय कर दिया ! कोई रास्ता न देख कर साहिबा ने मिर्जा को संदेसा भेजा कि उसे आकर ले जाये साहिबा की पुकार सुन कर मिर्जा तड़प उठा.और घर परिवार की परवाह किये बिना उसे लेने निकाल पड़ा ! कहते हैं जब वह घर से चला तो हर तरफ बुरे शगुन होने लगे पर मिर्जा तो ठान ही चुका था.अब रुकने का तो सवाल ही नही थाउधर साहिबा की बारात उसके गाँव पहुँच चुकी थी परन्तु साहिबा मिर्जा के आने की खबर सुन कर अपनी सहेली की सहायता से रात के समय उससे मिली ! बारात मुंह ताकती रह गयी. और साहिबा रात में ही मिर्जा के साथ भाग निकली रास्ते में फ़िरोज़ डोगर एक पुराने दुश्मन ने उनका रास्ता रोक लिया, और काफी देर तक उन्हें उलझाये रखा आखिर तंग आ कर मिर्जा ने अपनी तलवार निकाली और एक ही वार से उसका सिर उड़ा दिया.इस खूनी काण्ड से घबरा कर साहिबा ने मिर्जा से जल्द से जल्द उस स्थान से दूर चलने की सलाह दी.पर मिर्जा इस अनचाहे युद्ध से थकने से भी ज्यादा चिढ गया था अपनी थकान मिटाने के लिए वो एक पेड़ के नीचे सो गया ! साहिबा समझाती रही जगाती रही.पर अपनी 300 कानी (तीरों) के अभिमान में मिर्जा उसकी हर बात को नज़रअंदाज़ करता रहा अपने बाहुबल पर मिर्जा का बेवक्त अभिमान शायद नियति का ही कोई संकेत था जब बहुत अनुनय विनय के बाद मिर्जा नही माना तो साहिबा चुप सी हो गयी.लोग कहते हैं उसे शायद अपने भाइयों की भावी मृत्यु ने डरा दिया था. वो दुविधाग्रस्त हो गयी थी ! पर पता नही क्यों मुझे यहाँ साहिबा की उस खतरनाक रात में जल्दी से किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचने की जिद में कहीं भी अपने भाइयों के प्रति कोई भावना दिखाई नही पड़ती ! ये उसकी अपने प्यार के लिए चिंता है जिसे वो अब किसी भी खतरे से बचाना चाहती है. हद है कि जिसके लिए उसने अपने मान सम्मान , अपने परिवार की इज्ज़त और अपने जीवन तक को दांव पर लगा दिया.वही मिर्जा केवल वीरता दिखाने के लिए और 300 तीरों से हर दुश्मन का सीना चीरने के लिए इतना तत्पर है कि वहां बैठ कर उनका इंतज़ार करना चाहता है ! इस आत्माभिमान प्रदर्शन के जनून में वो ये भी भूल गया कि साहिबा से उसका मिलन दुनिया की हर चीज से ज्याद
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