अनुशासन क्या है..

क्या यह खुली आ जाती है क्या आजादी का मतलब है कि हम उस के नतीजों की परवाह ना करें क्या इसका मतलब कोई परेशानी आने या गलती हो जाने पर सही कदम उठाना है क्या यह धोखा हुआ है क्या यह नाजायत हे क्या यह आजादी का छीन लेता है जवाब दें इनमें से कोई भी नहीं अनुशासन का मतलब यह नहीं होता कि कोई छड़ी उठाए और बच्चों को पीटना शुरु कर दे यह तो पागलपन हे अनुशासन तो यह प्यार भरी धन पायो सही दिशा है परेशानियों को आने से पहले ही रोकने का नाम है यह अच्छी कार्य क्षमता के लिए हमारी शक्ति को एक कथित तौर कम बुद्ध करने का एक तरीका है अनुशासन उनके परिजनों के लिए कुछ कर ने का नाम है ना कि उसके साथ किए जाने वाला किसी भी तरह का व्यवहार है अनुशासन प्यार का एक इंतजार है कोई बार हमें बुराई करने के लिए भी बुरा बनाना पड़ता है सारी दवाईयां मीठी नहीं होती सारे ऑपरेशन बिना तकलीफ के नहीं होते फिर भी हमें इन का सहारा लेना नहीं पड़ता है हमें कुदरत से सीखना चाहिए एक विशाल जानवर जिराफ को हम अच्छी तरह से जानते हैं माता जीरा खड़े हुए अपने बच्चे को जन्म देती है मां के आरंभ देव गर्भ से निकल बच्चा एक का एक संख्या जमीन का पर आ गिरता है और वही जमीन पर बैठ जाता है इसके बाद माता जीरा का सबसे पहला काम होता है बच्चे के पीछे जाकर उसे एक जोरदार ठोकर मारना इस चोट से बच्चा वह तो जाता है लेकिन कमजोर और लड़खड़ाते पैरों की वजह से फिर गिर जाता है मां फिर से बच्चे के पीछे जाकर एक ठोकर और मारती है बच्चा खड़ा होकर फिर से गिर जाता है मां बच्चे को तब तक ठोकर मारती रहती है जब तक बच्चा अपने पैरों पर खड़ा होकर चलने ना लगे अपने ही बच्चे के साथ मां ने ऐसा क्यों किया मां जिराफ जानती है कि जिंदा रहने का यही एक जरिया है कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो जाए नहीं तो उसे जंगली जानवरों का शिकार बनने में देर नहीं लगेगी मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं कि क्या यह प्यार का इजहार इज़हार करना बेशक अक्सर देखा गया है कि प्यार और अनुशासन के माहौल में पढ़ने वाले बच्चे मां बाप का ज्यादा आदर करने वाले और कानून पर पालन करने वाले नागरिक बनते हैं इसी उल्टी बात भी उतना ही सच है
यह बात उस दौरान की है जब गांधीजी के आश्रम में सभी लोग एक साथ रसोईघर में बैठकर खाना खाते थे और सबके साथ गांधीजी भी खाते थे |किन्तु भोजनालय का एक नियम था कि जो व्यक्ति भोजन आरंभ होने से पहले भोजनालय में नहीं पहुचता था उसे अपनी बारी के लिए बरामदे में इंतजार करना पड़ता था | क्योंकि भोजन प्रारम्भ होते ही रसोईघर के दरवाजे को बंद कर दिया जाता था ताकि समय से न आने वाला व्यक्ति अन्दर न आने पाए |संयोगवश एक दिन गांधीजी को पहुंचने में कुछ क्षणों का विलम्ब हो गया और तब तक रसोई घर का दरवाजा बंद हो चूका था | बापू जी दरवाजे पर ही खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे | उनके एक मित्र ने देखा कि वह रसोई घर के दरवाजे के बाहर खड़े है और वहां बैठने के लिए कोई कुर्सी भी नहीं है .
अनुशासन की सीमाएं भी निर्धारित होती हैं।
जबकि शिक्षा का उद्देश्य समाज को बेहतर नागरिक प्रदान करना होता है, जो स्वस्थ समाज के निर्माण में भागीदार बनें। अनुशासन का लक्ष्य शिक्षा में नैतिकता का समर्थन करना है तो भले ही अनुशासन की पहली पाठशाला परिवार होता है, पर एक स्वस्थ समाज के निर्माण में निर्णायक भूमिका उसके विद्यालय निभाते हैं। ऐसे में यह प्रश्न और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे विद्यालयों में अनुशासन का कौन-सा स्वरूप होना चाहिए। इससे विद्यार्थियों में जहां शील, संयम, नम्रता और ज्ञान पिपासा जैसे गुणों का विकास होता है, वहीं विद्रोह की भावना के भी जन्म लेने के आसार बराबर बने रहते हैं। अधिकतर लोग अनुशासन का अर्थ किसी सैन्य परिसर, वहां के कठोर नियम और उनके पालन में ही खोजते हैं। इन्हीं पूर्वग्रहों के सबसे बड़े शिकार हमारे विद्यालय होते हैं। क्या किसी सैन्य परिसर के नियम और कड़ाई से उनकी अनुपालना अबोध या समझदार विद्यार्थियों की कुछ भी सीखने में मदद कर सकते हैं?
ज्यादातर शिक्षक विद्यालय में अनुशासन के सही अर्थों से अनभिज्ञ होते हैं। उन्हें यह कहते सुना जा सकता है कि बिना डर के बच्चे पढ़ेंगे कैसे! और खेलने से क्या होता है? अधिकतर विद्यार्थी खेलों में रुचि रखते हैं और इस कई ऐसे मौके आते हैं जब विद्यार्थी एक खिलाड़ी के रूप में खुद से नियमों का पालन करता है। वह आगे चल कर समाज के एक नागरिक के रूप में भी जारी रहता है। वास्तव में खेल ‘आत्मप्रेरित अनुशासन’ प्राप्ति का सबसे उपयुक्त माध्यम हैं, जिसे गांधीजी ने व्यक्तिगत अनुशासन कहा है। जब तक कोई भी व्यक्ति अपने आप अनुशासन और नियम-पालन में बंध नहीं जाता, तब तक उसे दूसरे से वैसा कराने की आशा करना व्यर्थ है। एक प्राचीन कहानी है, जिसमें अपने बच्चे के अधिक मिठाई खाने की शिकायत लेकर आई मां को गुरु नानक सात दिन बाद आने का समय देते हैं। इन सात दिनों तक खुद मीठा खाना छोड़ कर ही वे बालक को मीठे के अवगुणों के बारे में समझाते हैं।
आत्मप्रेरित अनुशासन ही मानवीय मूल्यों के लिए जगह बना पाता है। पहले शिक्षा के अंतर्गत आने वाले ‘सामुदायिक कार्यों में भागीदारी’ और ‘विद्यार्थियों के व्यवहार’ को महज खानापूर्ति के रूप में किया जाता था, जो अनुशासन विषयक पूर्णांकों के संबंधित है। जैसा कि उसके अंकों का प्राप्तांकों से कोई संबंध नहीं था। पर अब जबकि शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित बदलाव के तहत ‘सतत एवं व्यापक मूल्यांकन’ जैसी अवधारणा का समावेश हो चुका है, विद्यार्थी का संपूर्ण मूल्यांकनकर्ता उसका शिक्षक ही होगा। ऐसे में शिक्षकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे विद्यार्थियों के व्यवहार (अन्य विद्यार्थियों एवं शिक्षकों से) और सामुदायिक गतिविधियों वाले खानों (कॉलम) को गंभीरता से लें। फिर हो सकता है कि पाठ्यपुस्तकों से इतर मानव-मूल्यों को सही अर्थों में विद्यार्थियों तक प्रेषित करने में सफल हो पाएं.
हर घर में अगर अनुशासन का पालन किया जाए तो युवाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में 95% तक की कमी आ जाएगी अच्छे मां बाप किसी बात को लागू करने के लिए बच्चों की थोड़ी देर रहने वाली नापसंदगी और नाराजगी की परवाह नहीं करते.।

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