एक लड़के ने पतंग उड़ाते हुए अपने पिताजी से पूछा पतंग हवा में ऊपर कैसे टिकी रहती है.।

एक लड़के ने पतंग उड़ाते हुए अपने पिताजी से पूछा कि पतंग हवा में ऊपर कैसे टिकी रहती है पिता ने जवाब दिया की डोरी से बच्चे ने कहा पिताजी डोरी तो है जो पतंग को ऊपर जाने से रोक रही है पिता ने बच्चे से कहा कि देखो अब मैं इस दौर को तोड़ता हूं सोचिए कि उस पतंग के साथ क्या हुआ होगा जेसे...
पापा की पतंग बहुत ऊपर हवा में उड़ता देख उसे मजा आ रहा था। तभी पड़ोस वाले अंकल ने भी अपनी पतंग उड़ा दी और फिर दोनों पतंगें एक दूसरे को काटने में जुट गयी। कभी पापा की तो कभी अंकल की पतंग आगे निकल जाती। यह सब देख उस छोटे से लड़के से चुप नहीं रहा गया और बोला “पापा, अगर आपकी पतंग में ये डोर ना होती तो आप की पतंग अंकल से बहुत ऊंची उड़ जाती।” यह सुन लड़के के पापा थोड़ा मुस्कराए और फिर कुछ सोच कर उन्होंने पतंग की डोर अपने हाथ से तोड़ दी। अब क्या था, डोर टूटते ही पतंग लहराते हुए कुछ दूर नीचे आ गिरी। बच्चा निराश हो कर रोने वाली शक्ल बना देखता ही रह गया। तब उसके पापा उसके पास आए और बोले “बेटा, जब हम जिंदगी में कुछ पा कर एक ऊँचाई छू लेते हैं तो हमें लगता है कि शायद इसी डोर की तरह कुछ लोग हमारे विकास में बाधा डाल रहे हैं।” “बेटा, यह डोर एक घर, देश, संस्कृति, दोस्तों, सम्बन्धियों की तरह है जो हमें स्थिर रखने में सहायक होते हैं। अगर हम इन सब से नाता तोड़ देते है तो कुछ ऊँचा उड़ने के बाद हमारा भी वही होता है जो डोर टूटने पर पतंग का हुआ.
पिताजी ने बोला कि डोर से पतंग करती है वैसे ही लोग लड़ते हैं जैसे.
कभी आपने सोचा है कि दो लोग जब आपस में लड़ते हैं तो एक दूसरे पर जोर जोर से चिल्लाते क्यों हैं। जबकि दोनों आमने सामने सिर्फ एक फुट की दूरी पर होते है। लेकिन इतना क्रोधित हो ऐसे जोर से बोलते हैं मानो एक दूसरे से मीलों दूर खड़े हों। ऐसा इस लिए होता है क्योंकि दोनों के दिलों में दूरियाँ इतनी बढ़ गयी होती है कि उन्हें लगता है जोर से बात करने से शायद उनकी बात दूसरे के दिल तक पहुँच जाए। दूसरे के दिल को दुखाने के लिए कई अपशब्दों का प्रयोग भी किया जाता है। अब सोचो जब दो दोस्त आपस में बात करते है तो उनका स्वर कितना धीमा और मीठा होता है। उन्हें चिल्लाने की ज़रुरत नहीं पड़ती क्योंकि उनके दिल में कोई दूरी या मलाल नहीं होता। जब दिल मिले हों तो कभी कभी बात तक करने की ज़रुरत नहीं पड़ती। एक दूसरे की बात इशारों में ही समझ लेते हैं।
बस, इसी बात को गाँठ में बाँध लो। कभी किसी से ऊँचे स्वर में बात ना करो, कभी किसी को अपशब्द ना बोलो, ऐसी बात मत बोलो जिससे दिलों की दूरियाँ बढे।
बस बस ज्यादा उछलो मत ,मानव यहाँ किसी की नही चलने देगा ,अभी अभी तीन पतंग उसने काटे है मेरे सामने | बड़ी गजब डोर है उसके पास ,ऐसे काटती है जैसे महाबली शाका की तलवार हो |” हर्षिल ने चीकू को मुंह बनाते हुए कहा|  ऐसा कुछ नही है ,उसका आंतक अब खत्म होगा क्योकि मेरे पापा अभी बाजार जाने वाले है जहा मै उनके साथ लखनऊ की स्पेशल डोर खरीदने जा रहा हूँ | पूरी की पूरी रील ,और उसमे सद्दी नहीं होगी की समझे | बरेली डोर से आगे की चीज है यार |” हर्षिल ये सुनकर थोडा चौंका और उसने अपना पतंग छोडकर पूरी तरह से चीकू की और कंसन्ट्रेट किया | अरे ये लखनऊ वाली डोर के बारे में तो वो बिल्लू वाली कामिक्स में तुमने मुझे पढवाया भी था ,उसमे बिल्लू ने खूब पतंगे काटी थी और पिंकी बहुत खुश हुई थी |” हर्षिल ने थोडा हैरान होते हुए कहा | भैया इसके बारे में तो मैंने लोटपोट में भी पढ़ा है ,घसीटा की पतंग मोटू ने लखनऊ वाई डोर से ही काट दी थी ,बहुत सुपर डुपर डोर होती होगी ये |” सारांश उनमे सबसे छोटा था और मोटू पतलू वाली लोटपोट और चम्पक खूब पढता था | उसने भी अपनी बात पूरे सस्पेंस से कही | चीकू बेटे चलना है कि नहीं ,मै बाजार जा रहा हूँ |” चीकू के पापा की आवाज आई | उनोहने घर के बाहे अपनी बाइक स्टार्ट करते हुए कहा | अच्छा हर्षिल ,सारांश ,अभी एक घंटे बाद मिलते हैं ,फिर कल का प्लान बनायेंगे | सब ने एक दुसरे की तरफ देखकर हाँ में सर हिलाया और चीकू “ आया पापा कह कर अपने घर की तरफ दौड़ पड़ा | पतंगों के मौसम की वजह से बाजार में पतंगों की दुकान पर खूब भीड़ थी | ऊपर आसमान में भी यहाँ वहां पतंगे उडती कटती ,लहराती ऐसे लग रही थी जैसे किसी ने बहुत से रंग बिरंगे कागज आसमान में टांक दिए हो | पापा ,आप जब छोटे थे तो कौन सी डोर ज्यादा चलती थी | आपने ज्यादा पतंगे काटी या कटवाई |” चीकू ने अपने पापा के पीछे बैठे हुए कहा |  बेटा चीकू ,मैंने बचपन में खूब पतंगे उड़ाई है , हम सब बच्चे तो बाजार से कच्ची डोर जिसे टॉम लोग सद्दी कहते हो ,खरीद लेते थे | वर्धमान की कच्ची रील पूरी हजार मीटर , और उसे सूतने के लिए सम्मान बाजार से खरीद लेते | सुताई में कांच लगाने के लिए पुराने बल्ब और ट्यूब कूट पीस कर किसी बार्क चुनरी से उसे छान कर कांच का पाउडर बना लेते | फिर खुले मैदान में या दो पदों के बीच उसे सूतते | “पापा ने अपनी बचपन की याद को जैसे ताजा किया | चीकू के लिए ये सब कुछ एक नया अनुभव था |
क्या अब भी ऐसे सुताई कर सकते है आप “| चीकू ने जिज्ञासा दिखाई | करने को तो कोई बड़ी बात नहीं ,पर अब जब सब कुछ रेडीमेड बाजार में ही मिल रहा है तो कौन इतनी मेहनत करे | मेरा एक दोस्त है जो आज भी खुद डोर तैयार करता है और बाजार में बेचता है ,मै तुम्हे उसी से डोर दिलवा देता हूँ | लखनऊ की डोर का पुराना कारीगर है ,बस अपने घर में ही काम करता है |” पापा ने कहा | बाइक बाजार पार करते हुए एक गली में पहुंची | गली को पार सिरे पर एक मकान था जिसके सामने एक मैदान में कुछ पेड़ लगे थे | दो आदमी वहां पेड़ों के इर्द गिर्द घूम कर डोर की सुताई कर रहे थे |
“और अब्दुल भाई क्या हाल हैं ?” पापा ने एक आदमी को आवाज देते हुए कहा |  जी खुदा का फजल है शर्मा जी ,ले आये साहबजादे को ,इसके लिए मैंने डोर तैयार कर रखी है ,रुकिए लाता हूँ |” अब्दुल ने हाथ पोछे और एक चरखी पर लिपटी हुई लाल डोर लाकर चीकू के हाथ में दी |  लो बीटा ,खूब पतंग काटो ,ऐसी डोर है कि किसी को टिकने नहीं देगी “| अब्दुल ने पान चबाते हुए चीकु को मुस्कुराते हुए कहा थैंक यू ,अब्दुल अंकल “| चीकू के हाथ तो जैसे जादू की छड़ी लग गयी थी |
पापा ने अब्दुल को कुछ पैसे दिए और फिर पतंग वाली दूकान से उसे अलग अलग रंगों की पतंगे दिलवाई |
शाम घर रही थी | चीकू अपने घर की छत पर हर्षिल और सारांश के साथ बैठा नयी पतंगों में कन्ने दाल रहा था | इस काम के साथ साथ अगले दिन की योजना भी बन रही थी |  देखो जैसा कि प्लान बना है कि हम सब यहाँ मेरी छत पर इकठ्ठे पतंग उडायेगें और हमारा एक ही टार्गेट होगा मानव के साथ पेंच लड़कर उसके ज्यादा से ज्यादा पतंग काटना  चीकू बोला और एक बात हम आपस में एक दुसरे की पतंग को नहीं काटेंगें और चरखी लपेटने में ,फटे पतंग जोड़ने में एक दुसरे की मदद करेंगें | “ हर्षिल पंचशील के सिद्धांत की तरह रियेक्ट कर रहा था एक बात मेरी भी सुनो भैया ,जब पतंग हवा में टिका हो ,तो थोड़ी देर मुझे भी उड़ाने देना ,वरना मेरी तो बारी ही नहीं आएंगी |” सबसे छोटा दूसरी कक्षा में पढने वाला सारांश बोला | अरे तुम फिकर मत करो ,वैसे भी कल कोई पतंग यह टिकने वाली तो है ही नही ,ये स्पेशल डोर मैदान साफ़ कर देगी और अपनी पतंग खूब तनेगी ,तुम्हे तो बार बार पतंग उड़ने का मौका मिलेगा छोटे वह नीचे आ गई क्या हमारी जिंदगी में भी ऐसा नहीं होता कुछ चीजों के बारे में हम सोचते हैं कि वह हमें रोक नहीं है लेकिन असलियत में वे हमें ऊपर उठा रहे हैं अनुशासन इसी का नाम है।..

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