मातृतत्वम्

संसार में देखा जाता है कि ध्यान के दारा,स्वाध्याय के दारा अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर साधन कृताथ हो जाता है,परन्तु मातृतत्व का बोध उसके पक्षात ही कर पाता है। आत्मशुद्धि के बिना मातृतत्व का सही गीयान नहीं हो पाता है।
   जहाँ आघशकि मानव-स्वरूप में जन्म गहण करती है,वह स्थान,वह प्रदेश,वह भूमि धन्य हो जाती है।इसी प्रकार वह शुभ .समय भी अत्यन्त पुणयशील होता है,जब ईक्षरीय शकि वसुधा पर अवतरित होती है।

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