अपने घटिया नजरिया का एहसास हो जाने पर भी हम उसे बदलते क्यों नहीं

इंसानी फितरत आमतौर पर बदलाव का विरोध करती है बदलाव तकलीफ से होता है चाय इसका असर अच्छा हो या बुरा बदलाव तनाव भरा हो सकता है कभी-कभी अपने गलत या बुरे नजरिया को हम इतना आराम दे महसूस करते हैं कि हमारे अच्छे के लिए हो रहे बदलाव को भी हम कुबूल नहीं करना चाहते हम बुरे ही बने रहना चाहते हैं चार्ल्स डिकेंस ने एक ऐसे केंद्रीय के बारे में लिखा है जिसने कई साल अपनी सजा काल कोठरी में कटी एरिया होने पर उसे खुले आसमान के नीचे सूरत की रोशनी में लाया गया उस आदमी ने चारों तरफ देखा और अपनी पढ़ाई हुई नहीं आजादी में उसने खुद को तकलीफ में महसूस किया उसने फिर से अपनी कॉल टोकरी में जाने की इच्छा धारी की उसके लिए आजादी और खुली दुनिया के बदलाव के बजाए काल कोठरी हथकड़ी और अंधेरा की सुरक्षा और आराम देने वाला था

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